एक ख़त...
एक ख़त जो तूने कभी लिखा ही नहीं,
मैं रोज़ बैठकर उसका जवाब लिखता हूँ।
ख़्वाबों में तुझे अपना,
और अपने हाथ में तेरा हाथ लिखता हूँ।
बस तेरा एक दीदार,
और बाकी दिन तेरा सराब लिखता हूँ।
ख़ुद को एक तन्हा तारा,
और तुझे फ़लक का चाँद लिखता हूँ।
हाँ, लिखता हूँ मैं कहानियाँ,
और उनमें अपना नाम तेरे साथ लिखता हूँ।
तुझे इश्क़,
और ख़ुद को आशिक़ बेहिसाब लिखता हूँ।
मुस्कुराता हूँ फिर ये सोचकर...
हक़ीक़त से परे,
एक काल्पनिक ख़त का मैं
क्या ख़ूबसूरत जवाब लिखता हूँ।
— yours, always zoru ka gulam
Khat · Navjot Ahuja